नवरात्र के पावन अवसर पर जहां पूरे देशभर में महिलाएं मां दुर्गा की पूजा-अर्चना कर रही हैं, वहीं बिहार के भागलपुर जिले के नवगछिया के राजेंद्र कॉलोनी स्थित पुनामा प्रताप नगर की भगवती महारानी मंदिर की परंपरा कुछ अलग ही है। यहां पिछले करीब साढ़े 500 सालों से गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 1526 में चंदेल वंश के राजा प्रताप राव कामाख्या धाम, असम से मां की अखंड ज्योति लेकर यहां आए थे। उसी समय से यह नियम बना कि मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश नहीं होगा। तब से यह परंपरा बिना किसी विवाद के अब तक निभाई जा रही है। आश्चर्यजनक रूप से स्थानीय महिलाएं भी इसे देवी का आदेश मानकर सहज भाव से स्वीकार करती हैं।
प्रतिमा नहीं, अखंड ज्योति और 64 योगिनी की होती है पूजा
इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां किसी देवी-देवता की प्रतिमा की पूजा नहीं की जाती। नवरात्र के नौ दिनों में अखंड ज्योति और कलश की आराधना होती है। इसके साथ ही 64 योगिनी की विशेष पूजा-अर्चना भी की जाती है। भक्तों का विश्वास है कि इसी पूजा से माता भगवती प्रसन्न होती हैं और उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं।
विवाद कभी नहीं हुआ
भले ही महिलाएं गर्भगृह में प्रवेश नहीं कर पातीं, लेकिन वे मंदिर परिसर में रहकर पूरे श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करती हैं और मां से आशीर्वाद मांगती हैं। मंदिर समिति का कहना है कि यह परंपरा आस्था और विश्वास का प्रतीक है और इसका उद्देश्य किसी भी तरह से महिलाओं का सम्मान कम करना नहीं है। यही कारण है कि इस प्रथा को लेकर आज तक कोई विवाद नहीं हुआ।
यह परंपरा आस्था, विश्वास और सामाजिक सहमति का अद्भुत उदाहरण है, जो नवरात्र के दौरान और भी विशेष महत्व रखती है।
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