अमेरिका ने भारत पर 27 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का बड़ा फैसला लिया है, यह आरोप लगाते हुए कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर अत्यधिक कर लगाता है। यह कदम अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य व्यापार घाटे को कम करना और घरेलू उद्योगों को नई ताकत देना है। इस फैसले से भारत के कुछ निर्यात क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है, लेकिन तस्वीर इतनी भी धुंधली नहीं है जितनी दिखती है।
क्या भारत के लिए बुरी ख़बर है? जानिए पूरी सच्चाई
यह सच है कि भारत पर लगाए गए 27 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क से कई उद्योगों पर असर पड़ेगा, लेकिन भारत अभी भी अपने प्रतिस्पर्धियों से बेहतर स्थिति में है। अमेरिका ने बांग्लादेश (37 प्रतिशत), चीन (54 प्रतिशत), वियतनाम (46 प्रतिशत) और थाईलैंड (36 प्रतिशत) जैसे देशों पर और भी ऊंचे टैक्स लगा दिए हैं। इसका मतलब है कि अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों को कुछ हद तक फायदा हो सकता है क्योंकि अन्य देशों के सामान अधिक महंगे हो जाएंगे।
व्यापार घाटे को खत्म करने की चाल
ट्रंप प्रशासन का यह फैसला केवल भारत के खिलाफ नहीं, बल्कि एक बड़े वैश्विक गेम प्लान का हिस्सा है। उन्होंने करीब 60 देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाए हैं, ताकि अमेरिका को ‘सस्ते आयात’ से बचाया जा सके और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दिया जा सके। उनकी नीति स्पष्ट है—’जो अमेरिका पर कर लगाता है, हम भी उसे उसी अंदाज में जवाब देंगे!’
भारत अमेरिका को मुख्य रूप से टेक्सटाइल, स्टील, रसायन, ऑटोमोटिव पार्ट्स और फार्मास्युटिकल उत्पादों का निर्यात करता है। इस शुल्क वृद्धि से भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता है, लेकिन यह भी एक अवसर है कि भारत अपने निर्यात बाजारों को विविधता प्रदान करे और अमेरिका पर निर्भरता को कम करे।
भारतीय सरकार इस फैसले को लेकर अमेरिका के साथ बातचीत कर सकती है, ताकि शुल्क में कुछ राहत मिल सके। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह निर्णय ‘निगोशिएशन की रणनीति’ हो सकता है, यानी अमेरिका शुल्क बढ़ाकर भारत को बेहतर व्यापारिक शर्तों पर बातचीत के लिए मजबूर कर सकता है।
यह समय भारतीय कंपनियों के लिए अपने उत्पादों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने और नए बाजारों की खोज करने का है। सरकार भी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नई व्यापारिक रणनीतियों पर विचार कर सकती है। दूसरी तरफ, अमेरिका के इस फैसले से वैश्विक व्यापार जगत में हलचल मची हुई है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह नीति मुक्त व्यापार की अवधारणा के खिलाफ जाती है और अमेरिका को खुद नुकसान पहुंचा सकती है।
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