झारखंड में सरहुल का खुमार छाया रहा, और क्यों न हो! जब धरती अपनी हरी चादर ओढ़े, पेड़-पौधे नई कोंपलें निकालें और साल के फूल हर ओर महकने लगें, तब आदिवासी समाज कैसे पीछे रहे? सरहुल केवल एक पर्व नहीं, यह प्रकृति से प्रेम का जश्न है, उत्साह और उमंग का संगम है।
जैसे ही सरहुल का दिन आया, पूरा झारखंड मानो पारंपरिक धुनों पर झूम उठा। सफेद और लाल रंग की पारंपरिक साड़ियों और धोती-कुर्तों में सजे लोग साल वृक्ष की पूजा के लिए उमड़ पड़े। गाँव-गाँव, शहर-शहर, हर ओर बस एक ही नारा – “जोहार सरहुल!”
रांची से लेकर जमशेदपुर तक—हर गली में सरहुल का माहौल
सरहुल के दिन रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा, चाईबासा, जमशेदपुर और दुमका जैसे शहरों में अलग ही माहौल देखने को मिला। मंदिरों में पूजा-अर्चना के बाद पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूमते हुए श्रद्धालु शोभायात्रा में निकले। लोग कदम से कदम मिलाकर नाच रहे थे, जैसे खुद धरती भी उनके साथ झूम रही हो! मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी इस अवसर पर झारखंडवासियों को बधाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “प्रकृति महापर्व सरहुल के शुभ अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं और जोहार। प्रकृति का यह महापर्व सभी को स्वस्थ, सुखी और समृद्ध रखे, यही कामना करता हूँ।”
इस अवसर पर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने कहा, “सरहुल हमें प्रकृति से सीखने की प्रेरणा देता है। जैसे पेड़, पहाड़, नदी, सूर्य सभी हमें बिना किसी भेदभाव के जीवन देते हैं, वैसे ही हमें भी प्रेम, भाईचारे और एकता के साथ रहना चाहिए।”
झारखंड की पूर्व मुख्यमंत्री कल्पना मुर्मू सोरेन ने भी प्रदेशवासियों को शुभकामनाएँ देते हुए कहा, “प्रकृति पर्व सरहुल की समस्त झारखंडवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ और जोहार!”
वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इस पर्व को प्रकृति के संरक्षण का संदेश देने वाला बताया। उन्होंने कहा, “सरहुल हमें पर्यावरण से प्रेम करना सिखाता है। आइए, इस शुभ अवसर पर हम सभी प्रकृति की रक्षा और सामाजिक एकता का संकल्प लें।”
साल के फूलों की खुशबू और पारंपरिक नृत्य का जलवा
सरहुल के दिन साल के फूलों की खुशबू हर ओर फैली रहती है। इन फूलों को देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है और घरों के दरवाजों पर सजाया जाता है। सरहुल के मौके पर पारंपरिक लोकगीतों की गूँज पूरे प्रदेश में सुनाई दी। लोग अपने पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ झूमते रहे, गाते रहे और इस धरती के साथ अपने अटूट रिश्ते को मनाते रहे।
सरहुल सिर्फ एक त्योहार नहीं, यह एक संदेश है – प्रकृति से प्रेम करो, इसे सहेजो और इसे अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाओ। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन तभी सुंदर है जब हम पर्यावरण और समाज के साथ तालमेल बैठाकर चलें।
इस साल भी झारखंड में सरहुल को पूरे जोश और उल्लास के साथ मनाया जा रहा हैं। प्रकृति और संस्कृति के इस अद्भुत संगम ने एक बार फिर से लोगों को भाईचारे और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
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