उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर मुगलसराय से प्रधानमंत्री तक का सफर, और फिर एक रहस्यमयी मौत

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2 अक्तूबर को पूरी दुनिया गाँधी जयंती मनाती है। महात्मा गाँधी के विचारों के बारे में बात करती है। पर आज ही के दिन गाँधी से प्रेरित होकर राजनीति में आने वाले भारत के दूसरे प्राधनमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन है। एक ऐसे प्रधानमंत्री जिन्होंने केवल अठारह महीने कार्य भार संभाला पर इतने कम समय में भी अपना नाम भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा। 1964 में जवाहरलाल नेहरू के मृत्यु के बाद जब देश में प्रधानमंत्री कौन बनेगा का सवाल खड़ा हो गया, तब उन्हें उनकी साफ़ छवि के कारण प्रधानमंत्री बनाया जाता है।

प्रारम्भिक जीवन

शास्त्री जी सन् 1904 में उत्तर प्रदेश के मुगलसराय के एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के घर जन्मे। परिवार में सबसे छोटे होने के कारण परिवार में सब उन्हें प्यार से ‘नन्हें’ कहकर ही बुलाया करते थे। जब शास्त्री जी डेढ़ वर्ष के थे तब उनके पिता गुज़र गए। आगे के पढाई के लिए उनकी माँ उन्हें और उनके दो भाई बहन को लेकर अपने पिता के यहाँ चली गयी। लाल बहादुर कुछ और बड़े हुए तब वे शिक्षा के लिए अपने चाचा के पास वाराणसी चले गए। जब वह कक्षा दसवीं में थे तब महात्मा के एक भाषण से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए। जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया पर नाबालिक होने के कारण उन्हें छोड़ दिया गया। काशी विद्या पीठ से स्नातक की डिग्री हासिल की जिसका नाम “शास्त्री” था, आगे चल कर शास्त्री उनके नाम से जुड़ गया। 1927 में उनका विवाह ललिता देवी से हुआ।

18 महीने की ऐतिहासिक यात्रा

देश की आज़ादी के बाद सन् 1951 में शास्त्री जी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में कई अहम विभाग की जिम्मेदारी मिली। उन्हें रेल, परिवहन और संचार, वाणिज्य और उद्योग और ग्रह मंत्री बनाया गया। इससे पहले उन्होंने अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश में संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वे गृह मंत्री के पद तक पहुंच गये। 1964 में देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद उन्हें उनकी साफ़ छवि के कारण देश का दूसरा प्रधानमंत्री बनाया गया। 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक वह देश के प्रधानमंत्री रहे। इन डेढ़ वर्षों में उन्होंने श्वेत क्रांति(दूध उत्पादन) और हरित क्रांति(खाद्य उत्पादन) को बढ़ावा दिया।

अंतराष्ट्रीय मोर्चे पर कूटनीति

शास्त्री ने नेहरू की गुटनिरपेक्षता की नीति को जारी रखा पर उनके कार्यकाल में भारत ने सोवियत संघ के साथ भी संबंध बनाए। 1964 में, उन्होंने सीलोन में भारतीय तमिलों की स्थिति की चिंता में श्रीलंकाई प्रधान मंत्री सिरीमावो भंडारनायके के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को श्रीमावो-शास्त्री संधि के नाम से जाना जाता है। 1965 में, शास्त्री ने आधिकारिक तौर पर रंगून, बर्मा का दौरा किया और जनरल ने विन की सैन्य सरकार के साथ फिर से अच्छे संबंध स्थापित किए। भारत को 1965 में पाकिस्तान के एक और आक्रमण का सामना करना पड़ा। उन्होंने सुरक्षा बलों को जवाबी कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी और कहा कि “बल का जवाब बल से दिया जाएगा।” भारत-पाक युद्ध 23 सितंबर, 1965 को समाप्त हुआ। 10 जनवरी, 1966 को रूसी प्रधान मंत्री कोसिगिन ने लाल बहादुर शास्त्री को मध्यस्थता करने की पेशकश की और उनके पाकिस्तानी समकक्ष अयूब खान ने ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए।

इतिहास में दर्ज एक अनसुलझी गुत्थी

10 जनवरी की रात शास्त्री जी बीमार पड़ गए और एक घंटे बाद उनकी मृत्यु हो गई। उनका इलाज कर रहे डॉक्टरों ने उनकी मौत का कारण गंभीर दिल के दौरे को बताया। पर कई लोगों का मानना है कि पीएम को कुछ मजबूत प्रतिद्वंद्वियों के इशारे पर जहर दिया गया था।ऐसा इस लिए कहा जाने लगा क्योंकि शास्त्री जी का शरीर मृत्यु के बाद नीला पड़ गया था। ताशकंद और नई दिल्ली में भी चिकित्सकों ने इसे एक अजीब घटना बताया। हैरानी की बात यह है कि शास्त्री की मृत्यु के बाद और फिर जब उनका शव भारत की राजधानी पहुंचा तो ताशकंद में कोई पोस्टमॉर्टम नहीं किया गया। आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि एक प्रधानमंत्री के शव का पोस्टमार्टम क्यों नहीं किया गया। शास्त्री एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री है जिनकी मृत्यु के इतने साल बाद भी मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं है।


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